नज़्म मंज़र भोपाली
कभी रोज़ी कभी वो आशियाना छीन लेता है
जहाँ मिलता है मौका आबोदाना छीन लेता है
हथेली पर तेरी रंगे हिना कैसे सजाऊँ मैं
लहू तो सब का सब शातिर ज़माना छीन लेता है
हमें अपनी तबाही की ख़बर भी हो नहीं पाती
वो सब खुशियाँ हमारी गाहेबाना छीन लेता है
घने जंगल इसी की ज़द में आकर शहर बनते हैं
ये इंसा तो परिंदों से ठिकाना छीन लेता है
मेरे प्यारों ज़माने से कोई उम्मीद मत करना
ज़माना कुछ नहीं देता ज़माना छीन लेता है
"मंज़र भोपाली"
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