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अशोक साहिल

  तुम को मैं अपने उसूलों की कसम देता हूँ | मुझ को मजहब के तराजू में न तोला जाये || मैंने इंसान ही रहने की कसम खायी है | मुझ को हिन्दू या मुसलमान ना तोला जाए || कावा ओ काशी को कुछ नजदीक लाने के लिए | मैं भटकता फिर रहा हूँ पुल बनाने के लिए || बे हिचक मेरे लहू का कतरा कतरा खीच लो | अपने अपने जख्म का मरहम बनाने के लिए || (अशोक साहिल ) गमों की धूप में भी मुस्कुरा कर चलना पड़ता है | ये दुनिया है यहाँ चेहरा सजाकर चलना पड़ता है || तुम्हारा कद मेरे कद से बहुत ऊँचा सही लेकिन | चढाई पर कमर सब को झुका कर चढना पड़ता है || सियासत साजिशों का एक ऐसा खेल है जिसमें | कई चालों को भी खुद से बचा कर चलना पड़ता है || (अशोक साहिल )

नज़्म मंज़र भोपाली

 कभी रोज़ी कभी वो आशियाना छीन लेता है जहाँ मिलता है मौका आबोदाना छीन लेता है हथेली पर तेरी रंगे हिना कैसे सजाऊँ मैं लहू तो सब का सब शातिर ज़माना छीन लेता है हमें अपनी तबाही की ख़बर भी हो नहीं पाती वो सब खुशियाँ हमारी गाहेबाना छीन लेता है घने जंगल इसी की ज़द में आकर शहर बनते हैं ये इंसा तो परिंदों से ठिकाना छीन लेता है मेरे प्यारों ज़माने से कोई उम्मीद मत करना ज़माना कुछ नहीं देता ज़माना छीन लेता है "मंज़र भोपाली"

अन्नपूर्णा किसान सेवा केन्द्र एवं मीनाक्षी कौस्मैटिक स्टोर टीचर्स कालोनी रामपुर मोड़ चंडौस जनपद अलीगढ़।

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