अशोक साहिल
तुम को मैं अपने उसूलों की कसम देता हूँ | मुझ को मजहब के तराजू में न तोला जाये || मैंने इंसान ही रहने की कसम खायी है | मुझ को हिन्दू या मुसलमान ना तोला जाए || कावा ओ काशी को कुछ नजदीक लाने के लिए | मैं भटकता फिर रहा हूँ पुल बनाने के लिए || बे हिचक मेरे लहू का कतरा कतरा खीच लो | अपने अपने जख्म का मरहम बनाने के लिए || (अशोक साहिल ) गमों की धूप में भी मुस्कुरा कर चलना पड़ता है | ये दुनिया है यहाँ चेहरा सजाकर चलना पड़ता है || तुम्हारा कद मेरे कद से बहुत ऊँचा सही लेकिन | चढाई पर कमर सब को झुका कर चढना पड़ता है || सियासत साजिशों का एक ऐसा खेल है जिसमें | कई चालों को भी खुद से बचा कर चलना पड़ता है || (अशोक साहिल )